Delhi School Books Controversy: 28.60 रुपये की ‘मल्हार’ पर घमासान

कमीशन और गुणवत्ता को लेकर सरकार से सवाल
नई दिल्ली। Delhi School Books Controversy: दिल्ली के सरकारी स्कूलों के लिए पाठ्यपुस्तकों की खरीद अब राजनीतिक विवाद का विषय बन गई है। आठवीं कक्षा की हिंदी की किताब ‘मल्हार’ की खरीद दर को लेकर आम आदमी पार्टी (आप) और दिल्ली सरकार के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। शिक्षा मंत्री आशीष सूद ने शनिवार को खरीद में अनियमितताओं और कमीशनखोरी के आरोपों को खारिज करते हुए दावा किया कि सरकार ने यह पुस्तक केवल 28.60 रुपये प्रति कॉपी की दर से खरीदी है। इसके उलट, आप ने किताबों की कीमत, आकार, कागज की गुणवत्ता और आपूर्ति में देरी पर सवाल उठाए हैं।
शिक्षा मंत्री ने विपक्ष पर बिना तथ्यों की जांच किए घोटाले का आरोप लगाने और जनता को गुमराह करने का आरोप लगाया। उनका कहना है कि खरीद दर और टेंडर की शर्तों को समझे बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं है। दूसरी ओर, आप का तर्क है कि केवल कीमत बताने से खरीद प्रक्रिया से जुड़े सभी सवालों का जवाब नहीं मिलता। किताबों की वास्तविक गुणवत्ता और समय पर आपूर्ति की स्थिति भी स्पष्ट होनी चाहिए।
‘मल्हार’ की कीमत 28.60 रुपये या 65 रुपये, क्या है पूरा विवाद?
इस Delhi school books controversy के केंद्र में आठवीं कक्षा की हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘मल्हार’ है। आम आदमी पार्टी ने दिल्ली सरकार की खरीद दर पर सवाल उठाते हुए इसकी तुलना राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) की पुस्तक की कीमत से की थी। पार्टी की ओर से इस किताब की कीमत 65 रुपये प्रति कॉपी बताई गई।
जवाब में शिक्षा मंत्री आशीष सूद ने कहा कि दिल्ली सरकार ने ‘मल्हार’ की एक प्रति 28.60 रुपये में खरीदी है। इस तरह मंत्री ने विपक्ष की ओर से बताई गई कीमत और सरकारी खरीद दर के बीच अंतर को अपने बचाव का आधार बनाया।
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सूद ने पिछली सरकार के कार्यकाल का उदाहरण देते हुए कहा कि वर्ष 2022 में आठवीं कक्षा की गृह विज्ञान की एक पाठ्यपुस्तक 55 रुपये प्रति कॉपी की दर से छपवाई गई थी। उनके मुताबिक, इन आंकड़ों को देखते हुए वर्तमान खरीद को महंगा बताने के आरोपों की जांच तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए।
हालांकि, ‘मल्हार’ और गृह विज्ञान की पुस्तक की कीमतों की निष्पक्ष तुलना के लिए दोनों पुस्तकों के पृष्ठों की संख्या, कागज की गुणवत्ता, आकार, छपाई के मानक, ऑर्डर की कुल संख्या और आपूर्ति की शर्तों को देखना जरूरी है। इसी तरह, NCERT की पुस्तक और दिल्ली सरकार द्वारा खरीदी गई पुस्तक के संस्करण तथा विनिर्देशों का मिलान किए बिना केवल कीमत के आधार पर अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
आशीष सूद ने 2023 के किन पत्रों का हवाला दिया?
शिक्षा मंत्री ने अपने पक्ष में 17 अगस्त और 6 सितंबर 2023 को तत्कालीन शिक्षा सचिव की ओर से जारी दो पत्रों का उल्लेख किया। सूद के अनुसार, इन पत्रों में पिछली सरकार के कार्यकाल में छापी और आपूर्ति की गई पाठ्यपुस्तकों की गुणवत्ता को लेकर चिंताएं जताई गई थीं।
मंत्री ने इन दस्तावेजों के जरिए पूर्ववर्ती सरकार के समय पुस्तक छपाई और आपूर्ति की व्यवस्था पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि मौजूदा खरीद प्रक्रिया की आलोचना करने से पहले पुराने रिकॉर्ड और संबंधित पत्रों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
हालांकि, इन पत्रों में दर्ज टिप्पणियों और वर्तमान खरीद में कथित अनियमितताओं के बीच सीधा संबंध तभी स्थापित किया जा सकता है, जब संबंधित दस्तावेजों और परिस्थितियों की स्वतंत्र जांच की जाए। पुराने कार्यकाल में गुणवत्ता को लेकर उठी चिंताएं अपने आप में मौजूदा खरीद प्रक्रिया में किसी गड़बड़ी का प्रमाण नहीं हैं।
किताबों का आकार NCERT की पुस्तकों से छोटा था या नहीं?
पाठ्यपुस्तकों के आकार को लेकर उठे सवालों पर आशीष सूद ने कहा कि टेंडर में पुस्तकों के लिए 17.1 सेंटीमीटर × 24.1 सेंटीमीटर के आयाम निर्धारित किए गए थे। उनके मुताबिक, यह आकार पिछले वर्षों में अपनाए गए प्रारूप के अनुरूप था और इसे मापकर सत्यापित किया जा सकता है।
मंत्री ने यह भी कहा कि NCERT ने इस वर्ष अपनी पाठ्यपुस्तकों का आकार बढ़ाया है, लेकिन दिल्ली सरकार ने मौजूदा शैक्षणिक सत्र के लिए टेंडर पिछले वर्ष ही जारी किया था। उस समय निर्धारित आकार संबंधी विनिर्देश ही खरीद प्रक्रिया का आधार थे।
इसके विपरीत, आम आदमी पार्टी ने दावा किया कि मंत्री ने स्वयं स्वीकार किया है कि दिल्ली सरकार की खरीदी गई किताबें NCERT की पुस्तकों से छोटी थीं। इस मुद्दे पर दोनों पक्षों के दावों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए टेंडर में दर्ज आयाम, आपूर्ति की गई पुस्तकों के वास्तविक माप और NCERT के संबंधित संस्करणों का तुलनात्मक परीक्षण जरूरी है।
इसलिए विवाद का फैसला केवल बयानों के आधार पर नहीं, बल्कि खरीद के दस्तावेजों और वास्तविक पुस्तकों के माप के आधार पर किया जाना चाहिए।
किताबों की खरीद में 40 प्रतिशत कमीशन का आरोप क्या है?
पाठ्यपुस्तकों की खरीद में कथित 40 प्रतिशत कमीशन के आरोपों पर शिक्षा मंत्री ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। सूद ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि किताबों की कीमत की सही जानकारी के बिना घोटाले का दावा किया जा रहा है।
मंत्री ने इसके साथ ही आम आदमी पार्टी के शासनकाल में कथित तौर पर 60 प्रतिशत कमीशन का कारोबार चलने का आरोप भी लगाया। उन्होंने कहा कि इस संबंध में जल्द खुलासा किया जाएगा।
फिलहाल, 40 प्रतिशत और 60 प्रतिशत कमीशन से जुड़े दावे संबंधित पक्षों के आरोप हैं। उपलब्ध सामग्री में इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि करने वाले दस्तावेज या जांच के निष्कर्ष नहीं दिए गए हैं। इसलिए किसी भी पक्ष के आरोप को स्थापित तथ्य के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा।
इन दावों की वास्तविकता जानने के लिए खरीद प्रक्रिया के रिकॉर्ड, निविदा की शर्तों, भुगतान से जुड़े दस्तावेजों और किसी संबंधित जांच के निष्कर्षों की जरूरत होगी।
क्या दिल्ली सरकार ने दूसरी किताबों की खरीद दरें भी कम की हैं?
शिक्षा मंत्री आशीष सूद ने दावा किया कि महंगाई के बावजूद कई कक्षाओं की पाठ्यपुस्तकों की खरीद दरों में कमी आई है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि वर्ष 2022 में पिछली सरकार के दौरान आठवीं कक्षा की एक पाठ्यपुस्तक की अधिकतम कीमत 110 रुपये थी, जबकि मौजूदा खरीद में यह कीमत 50.40 रुपये है।
मंत्री ने इन आंकड़ों का हवाला देकर यह तर्क रखा कि वर्तमान खरीद को समग्र रूप से महंगा बताना सही नहीं है। उनके मुताबिक, अलग-अलग पुस्तकों की कीमतों को देखकर खरीद प्रक्रिया का मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
हालांकि, इस तुलना को समझने के लिए यह जानना भी जरूरी है कि दोनों पुस्तकों के विनिर्देश, पृष्ठ संख्या, कागज की गुणवत्ता, छपाई के मानक और उत्पादन लागत समान थे या नहीं। अलग-अलग विशेषताओं वाली पुस्तकों की कीमतों में अंतर होने पर केवल पुरानी और नई दरों की तुलना से खरीद की दक्षता का पूरा आकलन नहीं किया जा सकता।
आप ने किताबों की गुणवत्ता और आपूर्ति में देरी पर क्या सवाल उठाए?
आम आदमी पार्टी ने शिक्षा मंत्री के दावों पर सवाल उठाते हुए किताबों की गुणवत्ता और उनकी आपूर्ति में देरी का मुद्दा उठाया है। पार्टी का कहना है कि खरीद प्रक्रिया की पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए केवल प्रति पुस्तक कीमत बताना पर्याप्त नहीं है।
आप ने विशेष रूप से दो मांगें उठाई हैं।
पहली मांग: आपूर्ति में देरी से जुड़ी फाइल सार्वजनिक हो। पार्टी ने उस फाइल को सार्वजनिक करने की मांग की है, जिसमें किताबों की आपूर्ति में देरी के लिए विक्रेता पर जुर्माना लगाने का प्रस्ताव दिया गया था। इस दस्तावेज से यह समझने में मदद मिल सकती है कि आपूर्ति में देरी हुई थी या नहीं, उसकी वजह क्या थी और संबंधित अधिकारियों ने क्या कार्रवाई प्रस्तावित की थी।
दूसरी मांग: कागज की गुणवत्ता की प्रयोगशाला में जांच हो। आप ने किताबों में इस्तेमाल किए गए कागज की गुणवत्ता की लैब में जांच कराने की मांग की है। पार्टी का कहना है कि पुस्तकों की कीमत के साथ उनकी गुणवत्ता का परीक्षण भी जरूरी है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि आपूर्ति की गई किताबें निर्धारित मानकों के अनुरूप हैं या नहीं।
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इन मांगों पर सरकार की ओर से संबंधित फाइल सार्वजनिक किए जाने और प्रयोगशाला जांच कराने के संबंध में क्या कदम उठाए जाते हैं, यह विवाद के आगे के घटनाक्रम में महत्वपूर्ण होगा।
दिल्ली स्कूल बुक्स विवाद में अब किन दस्तावेजों से स्पष्ट होगी स्थिति?
दिल्ली के सरकारी स्कूलों की पाठ्यपुस्तकों की खरीद को लेकर फिलहाल सरकार और विपक्ष अपने-अपने दावे पेश कर रहे हैं। शिक्षा मंत्री ने खरीद दरों और पुराने रिकॉर्ड का हवाला देकर घोटाले के आरोपों को खारिज किया है। वहीं, आम आदमी पार्टी ने किताबों की गुणवत्ता, आकार और आपूर्ति में देरी से जुड़े सवालों पर जवाब मांगा है।
इस विवाद की निष्पक्ष जांच के लिए कुछ प्रमुख दस्तावेजों और तथ्यों का परीक्षण जरूरी होगा:
- ‘मल्हार’ की खरीद से संबंधित मूल टेंडर और उसकी सभी शर्तें।
- किताबों की निर्धारित और वास्तविक आपूर्ति दरें।
- पुस्तकों के आकार, पृष्ठ संख्या और कागज की गुणवत्ता के विनिर्देश।
- आपूर्ति में देरी और विक्रेता पर जुर्माने से संबंधित फाइल।
- कागज की गुणवत्ता की स्वतंत्र प्रयोगशाला जांच के नतीजे।
- 17 अगस्त और 6 सितंबर 2023 के पत्रों में दर्ज टिप्पणियां।
- 40 प्रतिशत और 60 प्रतिशत कमीशन से जुड़े आरोपों के समर्थन में उपलब्ध दस्तावेज।
इन तथ्यों की जांच से यह समझने में मदद मिलेगी कि खरीद प्रक्रिया निर्धारित नियमों के अनुसार हुई या नहीं और गुणवत्ता तथा आपूर्ति को लेकर उठाए गए सवालों में कितनी सच्चाई है।
फिलहाल, दिल्ली की पाठ्यपुस्तक खरीद का मामला राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच है। आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार संबंधित दस्तावेजों और गुणवत्ता संबंधी सवालों पर क्या स्पष्टीकरण देती है तथा विपक्ष अपने आरोपों के समर्थन में कौन से साक्ष्य सामने रखता है।
