Election Commission Controversy: चुनाव आयोग पर हमलों के बीच बीजेपी का कांग्रेस पर करारा पलटवार

पूर्व चुनाव आयुक्तों के राजनीतिक पदों और SIR-वोट चोरी के मुद्दों पर गरमाई सियासत: जानिए केंद्रीय मंत्री ने विपक्ष को क्या दी चुनौती
Bjp, Election Commission Controversy: नई दिल्ली। देश की चुनावी व्यवस्था, मतदाता सूचियों के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (SIR) और निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता को लेकर राष्ट्रीय राजधानी से लेकर राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर तीखी बहस छिड़ गई है। ताजा election commission controversy के इस गरमागरम माहौल के बीच भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने आक्रामक रुख अपनाते हुए कांग्रेस और विपक्षी दलों पर जोरदार पलटवार किया है।
सत्ता पक्ष का साफ कहना है कि एनडीए सरकार ने निर्वाचन आयोग को पूरी तरह स्वतंत्र रूप से और बिना किसी दबाव के काम करने की पूरी छूट दी है। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कांग्रेस के पुराने राजनीतिक इतिहास और उसके नेताओं की कार्यशैली पर तीखे सवाल खड़े किए हैं।
कांग्रेस अपने शासनकाल के इतिहास की करे समीक्षा: पीयूष गोयल
केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने मुख्य विपक्षी दल को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि दूसरों पर बेबुनियाद आरोप लगाने से पहले कांग्रेस को अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। मौजूदा election commission controversy के संदर्भ में उन्होंने यह गंभीर सवाल उठाया कि जब कांग्रेस के अपने शासनकाल में पूर्व चुनाव आयुक्तों को राजनीतिक टिकट, केंद्रीय मंत्रिमंडल में मंत्री पद और राज्यपाल जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक पद सौंपे गए थे, तब क्या निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर कोई सवाल नहीं उठा था?
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गोयल के मुताबिक, राजनीतिक इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं जब चुनाव आयोग से जुड़े सेवानिवृत्त अधिकारियों को बाद में कांग्रेस सरकारों द्वारा बड़े राजनीतिक और संवैधानिक ओहदे दिए गए। भाजपा का तर्क है कि इस तरह के पुराने मामलों को देखते हुए कांग्रेस को यह आत्ममंथन करना चाहिए कि संवैधानिक संस्थाओं के प्रति उनका अपना ट्रैक रिकॉर्ड कैसा रहा है।
हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि किसी अधिकारी की सेवानिवृत्ति के बाद की नियुक्ति मात्र से यह प्रमाणित नहीं हो जाता कि उसने अपने कार्यकाल के दौरान पक्षपात किया था, लेकिन राजनीतिक मंचों पर यह मुद्दा हमेशा से बहस के केंद्र में रहा है।
राहुल गांधी बने कांग्रेस के लिए ‘रेड फ्लैग’, SIR और वोट चोरी पर पूछे 10 सवाल
इस राजनीतिक टकराव और बढ़ती election commission controversy के बीच बीजेपी ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर भी सीधा और कड़ा हमला बोला है। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने राहुल गांधी को कांग्रेस पार्टी के लिए सबसे बड़ा ‘रेड फ्लैग’ करार दिया है।
उन्होंने चुनावी प्रक्रियाओं की पारदर्शिता और मतदाता सूचियों में कथित अनियमितताओं को लेकर राहुल गांधी तथा उनकी पार्टी द्वारा उठाए जा रहे सवालों पर कड़ी आपत्ति जताई है।
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बीजेपी ने विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (Special Intensive Revision SIR), मतदाता सूची की शुचिता और कथित ‘वोट चोरी’ जैसे गंभीर मुद्दों पर राहुल गांधी से 10 तीखे सवाल पूछे हैं। सत्ता पक्ष का रुख पूरी तरह स्पष्ट है कि यदि विपक्ष के पास चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली या मतदाता सूचियों में धांधली को लेकर कोई ठोस प्रमाण या आंकड़े हैं, तो उन्हें सार्वजनिक मंच पर रखना चाहिए, न कि केवल हवा में राजनीतिक बयानबाजी करनी चाहिए।
अधीर रंजन चौधरी के बयान का हवाला देकर कांग्रेस को घेरा
विपक्ष के बयानों में मौजूद अंतर्विरोध को उजागर करने और जारी election commission controversy पर अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए बीजेपी ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद अधीर रंजन चौधरी के पुराने बयानों का भी विशेष रूप से उल्लेख किया है। पीयूष गोयल ने याद दिलाया कि कैसे पश्चिम बंगाल में चुनावी प्रक्रिया और आयोग के कामकाज को लेकर अधीर रंजन चौधरी ने सकारात्मक और अनुकूल टिप्पणियां की थीं।
भाजपा का यह तर्क है कि यदि किसी खास राज्य या चुनाव में विपक्षी दल निर्वाचन आयोग के काम की सराहना करते हैं, तो अन्य परिस्थितियों में राजनीतिक नफा-नुकसान के तहत उसी आयोग पर बिना तथ्यों के सवाल उठाना उनके दोहरे चरित्र को उजागर करता है। हालांकि, जानकारों का यह भी मानना है कि अलग-अलग राज्यों के चुनावी माहौल और प्रशासनिक परिस्थितियों का मूल्यांकन उनके अपने विशिष्ट संदर्भों के आधार पर किया जाना चाहिए।
एम.एस. गिल के कार्यकाल और पुरस्कारों पर भी उठे सवाल
इस पूरी बहस को और विस्तार देते हुए केंद्रीय मंत्री ने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एम.एस. गिल के कार्यकाल का भी जिक्र किया। एम.एस. गिल ने वर्ष 1996 से 2001 के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में देश की चुनावी कमान संभाली थी और वर्ष 2000 में उन्हें देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया गया था।
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पीयूष गोयल ने यह सवाल उठाया कि क्या पद पर रहते हुए इस प्रकार के बड़े राष्ट्रीय सम्मान मिलना तत्कालीन सरकार के साथ उनके कामकाजी संबंधों का परिणाम था? हालांकि, इस तरह के ऐतिहासिक फैसलों और पुरस्कारों को सीधे तौर पर पक्षपात का पुख्ता प्रमाण मान लेना बिना ठोस दस्तावेजों के संभव नहीं है, लेकिन यह मुद्दा राजनीतिक बहसों में एक बार फिर प्रासंगिक हो गया है।
मतदाता के भरोसे की असली कसौटी और लोकतांत्रिक मर्यादाएं
मौजूदा election commission controversy और चुनाव आयोग की स्वायत्तता को लेकर चल रही यह तकरार इस बात को रेखांकित करती है कि भारतीय लोकतंत्र में संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता सर्वोच्च प्राथमिकता है। एक तरफ जहां एनडीए सरकार यह दावा करती है कि उसने निर्वाचन आयोग को बिना किसी राजनीतिक हस्तक्षेप के स्वतंत्र रूप से काम करने का माहौल दिया है, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष मतदाता सूची के प्रबंधन और चुनावी प्रक्रिया की शुद्धता को लेकर लगातार चिंताएं व्यक्त कर रहा है।
लोकतंत्र की मूल भावना इसी बात में निहित है कि देश के प्रत्येक पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची में सुरक्षित हो, सूचियों के पुनरीक्षण की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी हो और किसी भी शिकायत का निष्पक्ष समाधान सुनिश्चित किया जाए। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप अपनी जगह राजनीति का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन देश के हर मतदाता का संवैधानिक तंत्र और चुनावी प्रक्रिया पर अटूट भरोसा बना रहना ही किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत होती है।
