X-ray Machine: 9 साल की बच्ची 4 घंटे तड़पती रही, जांच नहीं हुई

जग प्रवेश चंद्र अस्पताल में मरीजों को घंटों परेशानी का सामना करना पड़ा
पूर्वी दिल्ली। X-ray machine खराब होने से पूर्वी दिल्ली के जग प्रवेश चंद्र अस्पताल (Jag pravesh chand hospital) में मरीजों को घंटों परेशानी का सामना करना पड़ा। इनमें नौ वर्षीय शिवांशी भी शामिल रही, जो सीढ़ियों से गिरने के बाद कमर में चोट लगने पर अस्पताल पहुंची थी। डॉक्टरों ने उसे एक्स-रे कराने की सलाह दी थी, लेकिन मशीन खराब होने के कारण करीब चार घंटे तक उसकी जांच नहीं हो सकी। बच्ची के पिता के अनुसार, वह दर्द से रोती रही और परिवार उसे किसी तरह शांत कराने की कोशिश करता रहा। इसी दौरान कलाई में चोट लेकर पहुंचे 27 वर्षीय अजय को भी करीब चार घंटे तक इंतजार करना पड़ा। इस स्थिति ने अस्पताल में जांच सुविधा, मरीजों की सूचना व्यवस्था और वैकल्पिक इंतजाम को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अस्पताल में एक्स-रे बंद होने से मरीजों की मुश्किल बढ़ी
जग प्रवेश चंद्र अस्पताल में X-ray machine खराब होने का असर उन मरीजों पर पड़ा, जिन्हें चोट या अन्य चिकित्सकीय जरूरत के कारण जांच की आवश्यकता थी। अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों और उनके तीमारदारों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह रही कि जांच कब शुरू होगी, इसका उन्हें स्पष्ट जवाब नहीं मिल पा रहा था। कई लोग विभाग के चक्कर लगाते रहे और इंतजार करते रहे। बताया गया कि कुछ मरीजों को करीब चार से पांच घंटे तक जांच का इंतजार करना पड़ा। इसके बावजूद उन्हें एक्स-रे की सुविधा नहीं मिल सकी और अगले दिन आने की सलाह दिए जाने की बात सामने आई।
ऐसे समय में जब किसी मरीज को चोट लगी हो और डॉक्टर ने जांच कराने की सलाह दी हो, उसके लिए इंतजार केवल समय बीतने की बात नहीं होती। मरीज पहले से दर्द और चिंता की स्थिति में होता है। इसके ऊपर यह पता न होना कि जांच कब होगी, परेशानी को और बढ़ा देता है। जग प्रवेश चंद्र अस्पताल की इस घटना में भी यही स्थिति सामने आई। मरीजों के अनुसार, उन्हें मशीन खराब होने की जानकारी तो दी जा रही थी, लेकिन उसके बाद क्या व्यवस्था होगी, इसे लेकर स्पष्टता नहीं थी।
नौ वर्षीय बच्ची की चार घंटे की पीड़ा
इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा चिंता नौ वर्षीय शिवांशी को लेकर सामने आई। परिजनों के अनुसार, बच्ची सीढ़ियों से गिर गई थी और उसकी कमर में चोट लगी थी। इसके बाद उसे जग प्रवेश चंद्र अस्पताल लाया गया। डॉक्टरों ने एक्स-रे कराने की सलाह दी, ताकि चोट की स्थिति की जांच की जा सके। लेकिन अस्पताल की X-ray machine खराब होने के कारण जांच समय पर नहीं हो सकी।
बच्ची के पिता के मुताबिक, शिवांशी लगातार दर्द के कारण रो रही थी। परिवार के लोग उसे शांत कराने की कोशिश करते रहे, लेकिन समय बीतता गया। करीब चार घंटे तक एक्स-रे नहीं हो सका। पिता ने अपनी परेशानी बताते हुए कहा, “बच्ची को काफी दर्द है और अस्पताल में मशीन खराब होने की बात कही जा रही है। ऐसे में वह अपनी बच्ची को लेकर कहां जाएं, यह समझ में नहीं आ रहा।”
इस स्थिति ने एक परिवार की तत्काल परेशानी को सामने ला दिया। साथ ही यह सवाल भी उठाया कि किसी सरकारी अस्पताल में आवश्यक जांच की मशीन काम नहीं कर रही हो तो मरीज के लिए अगला विकल्प क्या होना चाहिए। खासकर तब, जब मरीज बच्चा हो और वह चोट के कारण पहले से दर्द में हो।
कलाई की चोट लेकर पहुंचे अजय भी इंतजार में रहे
शिवांशी अकेली मरीज नहीं थीं जिन्हें X-ray machine खराब होने का खामियाजा भुगतना पड़ा। सीलमपुर निवासी 27 वर्षीय अजय भी हाथ की कलाई में चोट लगने के बाद अस्पताल पहुंचे थे। उन्हें भी एक्स-रे की जरूरत थी। अजय का आरोप है कि अस्पताल में उन्हें लगातार इंतजार करने के लिए कहा जाता रहा।
अजय के अनुसार, करीब चार घंटे बीतने के बाद भी उन्हें यही बताया जाता रहा कि एक्स-रे जल्द हो जाएगा। उन्होंने इंतजार किया, लेकिन उनकी जांच नहीं हो सकी। चोट के साथ अस्पताल पहुंचे मरीज के लिए यह स्थिति कितनी मुश्किल हो सकती है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जांच के इंतजार में उन्हें लंबे समय तक अस्पताल में रहना पड़ा।
मरीजों की ओर से यह भी कहा गया कि चोट की स्थिति में समय पर एक्स-रे होना उपचार की दिशा तय करने के लिए महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में X-ray services बाधित होने पर मरीज को केवल जांच में देरी नहीं झेलनी पड़ती, बल्कि आगे की चिकित्सा प्रक्रिया को लेकर भी अनिश्चितता बनी रहती है।
X-ray machine: मशीन खराब थी तो वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं हुई?
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल केवल X-ray machine के खराब होने को लेकर नहीं है। मशीन किसी भी अस्पताल में तकनीकी खराबी के कारण कुछ समय के लिए बंद हो सकती है। असली सवाल यह है कि उसके बाद मरीजों के लिए क्या वैकल्पिक व्यवस्था की गई।
मरीजों और तीमारदारों की शिकायत के मुताबिक, उन्हें यह स्पष्ट नहीं बताया गया कि मशीन कब तक ठीक होगी। इसके अलावा यह जानकारी भी साफ नहीं थी कि जब तक मशीन काम नहीं कर रही है, तब तक मरीजों की जांच कहां कराई जाएगी। लोग बार-बार एक्स-रे विभाग के चक्कर लगाते रहे और स्थिति स्पष्ट होने का इंतजार करते रहे।
यदि किसी बड़े सरकारी अस्पताल में diagnostic services से जुड़ी महत्वपूर्ण मशीन खराब हो जाती है, तो मरीजों को केवल इंतजार करने के लिए छोड़ देना व्यवस्था से जुड़ा सवाल बन जाता है। ऐसी स्थिति में मरीजों को वैकल्पिक सरकारी स्वास्थ्य केंद्र की जानकारी, रेफरल व्यवस्था या उपलब्ध दूसरे विकल्प के बारे में स्पष्ट सूचना दिए जाने की जरूरत पर सवाल उठ रहे हैं। इस घटना में मरीजों की शिकायत का मुख्य हिस्सा भी यही है कि मशीन खराब होने के बाद उन्हें स्पष्ट वैकल्पिक व्यवस्था नहीं दिखाई दी।
मरीजों को जानकारी मिलने में भी परेशानी
अस्पताल की इस स्थिति में एक और बात सामने आती है। मरीजों को केवल जांच का इंतजार नहीं करना पड़ा, बल्कि उन्हें यह जानने के लिए भी इंतजार करना पड़ा कि जांच कब संभव होगी। अस्पताल में आने वाले मरीजों के लिए सूचना की स्पष्टता बेहद महत्वपूर्ण होती है। यदि कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है, तो मरीज और उसके परिवार को समय रहते इसकी जानकारी मिलना जरूरी है, ताकि वे आगे की व्यवस्था के बारे में निर्णय ले सकें।
शिवांशी के परिवार के सामने यही परेशानी थी। बच्ची दर्द में थी और परिवार के सामने यह स्पष्ट नहीं था कि X-ray machine कब तक ठीक होगी। पिता की चिंता भी इसी अनिश्चितता को लेकर सामने आई। उन्हें यह समझ नहीं आ रहा था कि बच्ची को लेकर कहां जाएं।
अजय के मामले में भी करीब चार घंटे तक इंतजार करने के बाद जांच नहीं हो सकी। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि अस्पताल में मरीजों को मशीन की स्थिति और वैकल्पिक जांच व्यवस्था की जानकारी देने का तरीका क्या है।
स्वास्थ्य सुविधाओं के दावों के बीच जमीनी सवाल
दिल्ली में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को बेहतर बनाने, अस्पतालों का आधुनिकीकरण करने और मरीजों को सुविधाएं उपलब्ध कराने की बातें लगातार होती रही हैं। सरकारी स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने और तकनीकी सुविधाओं को बढ़ाने पर भी जोर दिया जाता रहा है। लेकिन किसी भी स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविक परीक्षा तब होती है, जब मरीज अस्पताल पहुंचता है और उसे तत्काल किसी जांच या उपचार की जरूरत होती है।
जग प्रवेश चंद्र अस्पताल की यह घटना इसी अंतर की ओर ध्यान खींचती है। एक तरफ आधुनिक और मरीज-केंद्रित healthcare system की बात होती है। दूसरी तरफ, एक घायल बच्ची को X-ray machine खराब होने के कारण करीब चार घंटे तक इंतजार करना पड़ा। इसी तरह कलाई में चोट लेकर पहुंचे एक अन्य मरीज को भी लंबे इंतजार के बाद जांच नहीं मिल सकी।
यह स्थिति केवल मशीन की तकनीकी खराबी तक सीमित नहीं रह जाती। इसके साथ maintenance, backup व्यवस्था, सूचना प्रणाली और hospital administration की जवाबदेही जैसे सवाल भी जुड़ जाते हैं। हालांकि, इन व्यवस्थाओं के बारे में इस घटना में अस्पताल प्रशासन की ओर से कोई पक्ष उपलब्ध नहीं कराया गया है। इसलिए इन सवालों का अंतिम जवाब संबंधित अस्पताल और स्वास्थ्य अधिकारियों की प्रतिक्रिया के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
योजनाओं से ज्यादा जरूरी उनका असर
किसी भी सरकारी स्वास्थ्य योजना का असर अंततः मरीज तक पहुंचने वाली सुविधा से मापा जाता है। अस्पताल की इमारत, उपकरण और घोषणाएं अपनी जगह हैं, लेकिन मरीज के सामने सबसे अहम सवाल यही होता है कि जरूरत के समय जांच और उपचार उपलब्ध है या नहीं।
शिवांशी के मामले में जरूरत एक्स-रे की थी। डॉक्टर ने जांच की सलाह दी थी। लेकिन मशीन खराब होने के कारण परिवार को इंतजार करना पड़ा। वहीं अजय को भी चोट के बाद इसी तरह की परेशानी का सामना करना पड़ा। इन दोनों मामलों ने यह सवाल सामने रखा है कि मौजूदा medical facilities में किसी महत्वपूर्ण उपकरण के अचानक बंद होने की स्थिति में मरीजों के लिए backup व्यवस्था कितनी प्रभावी है।
सरकारी अस्पतालों में आने वाले मरीजों में ऐसे परिवार भी होते हैं जिनके लिए निजी अस्पताल में तुरंत जांच कराना आसान नहीं होता। स्रोत में स्थानीय लोगों की ओर से यही बात कही गई है। ऐसे परिवारों के लिए सरकारी अस्पताल की जांच व्यवस्था महत्वपूर्ण सहारा होती है। इसलिए वहां उपलब्ध diagnostic services में व्यवधान होने पर उसका सीधा असर मरीज और उसके परिवार पर पड़ता है।
अस्पताल की पुरानी शिकायतों से फिर जुड़ा नया सवाल
जग प्रवेश चंद्र अस्पताल पहले भी विभिन्न समस्याओं को लेकर चर्चा में रहा है। मरीजों और स्थानीय लोगों की ओर से अस्पताल की व्यवस्था, पार्किंग, सुरक्षा और उपचार संबंधी सुविधाओं को लेकर समय-समय पर सवाल उठाए जाते रहे हैं। अब X-ray machine खराब होने और उसके बाद वैकल्पिक व्यवस्था नहीं होने की शिकायत ने अस्पताल प्रशासन की कार्यप्रणाली को लेकर एक नया सवाल खड़ा कर दिया है।
यहां यह समझना भी जरूरी है कि इन पुराने आरोपों को वर्तमान घटना का प्रत्यक्ष कारण नहीं माना जा सकता। लेकिन स्थानीय लोगों की ओर से पहले उठाई गई शिकायतों के बीच अब एक्स-रे सुविधा को लेकर सामने आई परेशानी ने अस्पताल की व्यवस्थाओं पर चर्चा को फिर तेज किया है।
मरीजों के लिए समस्या इसलिए भी गंभीर है क्योंकि सरकारी अस्पताल उनके लिए उपचार का महत्वपूर्ण विकल्प होते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि आर्थिक रूप से सीमित संसाधनों वाले परिवारों के लिए निजी अस्पताल में तत्काल X-ray services लेना हमेशा संभव नहीं होता। ऐसे में सरकारी अस्पताल की सुविधा बाधित होने पर उनके सामने विकल्प सीमित हो जाते हैं।
अब अस्पताल प्रशासन से किन सवालों के जवाब जरूरी?
जग प्रवेश चंद्र अस्पताल में सामने आई घटना के बाद कई सवाल सीधे अस्पताल प्रशासन और संबंधित स्वास्थ्य अधिकारियों से जुड़े हैं। पहला सवाल यह है कि X-ray machine की खराबी की नियमित निगरानी किस तरह की जाती है। दूसरा सवाल यह है कि मशीन के खराब होने पर मरीजों के लिए वैकल्पिक जांच की क्या व्यवस्था है। तीसरा सवाल सूचना से जुड़ा है कि मरीजों और तीमारदारों को मशीन खराब होने तथा संभावित समाधान की जानकारी किस तरह दी जाती है।
इसके अलावा यह भी सवाल है कि घायल मरीजों को घंटों इंतजार क्यों करना पड़ा। यदि किसी मरीज को तत्काल जांच की जरूरत थी, तो उसे किसी दूसरे सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में रेफर करने की व्यवस्था क्यों नहीं की गई, यह भी स्पष्ट किया जाना बाकी है।
इन सवालों का जवाब केवल एक अस्पताल की व्यवस्था को समझने के लिए जरूरी नहीं है। यह सरकारी अस्पतालों में patient care और emergency care की तैयारी से भी जुड़ा विषय है। मशीनों का खराब होना तकनीकी समस्या हो सकती है, लेकिन उस खराबी के बाद मरीज को किस तरह संभाला जाता है, यह प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा है।
बैकअप व्यवस्था पर सबसे बड़ा सवाल
किसी भी आवश्यक जांच सुविधा के बाधित होने की स्थिति में backup व्यवस्था मरीज के लिए सबसे महत्वपूर्ण हो सकती है। यदि मशीन तत्काल ठीक नहीं हो सकती, तो मरीज को वैकल्पिक केंद्र की जानकारी मिलनी चाहिए। यदि रेफरल संभव है, तो उसकी व्यवस्था स्पष्ट होनी चाहिए। और यदि कुछ समय बाद मशीन शुरू होने की संभावना है, तो मरीजों को वास्तविक स्थिति बताई जानी चाहिए।
जग प्रवेश चंद्र अस्पताल के मामले में मरीजों और तीमारदारों की शिकायत यह है कि उन्हें इस तरह की स्पष्ट व्यवस्था दिखाई नहीं दी। कई लोग इंतजार करते रहे। कुछ मरीजों को अगले दिन आने की सलाह दिए जाने की बात सामने आई। यही वजह है कि अब hospital infrastructure और मरीज-केंद्रित व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं।
हालांकि, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि इस रिपोर्ट में अस्पताल प्रशासन की ओर से मशीन की खराबी का तकनीकी कारण, खराबी की अवधि या उसे ठीक करने की समयसीमा उपलब्ध नहीं है। इसलिए इन पहलुओं पर कोई अनुमान लगाना उचित नहीं होगा।
उच्च अधिकारी संज्ञान लेते हैं या नहीं, इस पर नजर
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल संबंधित उच्च अधिकारियों की प्रतिक्रिया को लेकर है। मरीजों की शिकायतों के बीच यह देखना होगा कि क्या X-ray machine की खराबी को लेकर कोई कार्रवाई होती है। क्या वैकल्पिक जांच सुविधा उपलब्ध कराई जाती है। क्या मरीजों की शिकायतों की जांच होती है। और क्या भविष्य में ऐसी स्थिति से बचने के लिए मशीनों की नियमित देखभाल तथा backup व्यवस्था को मजबूत किया जाता है।
सरकार यदि मरीज-केंद्रित स्वास्थ्य व्यवस्था को प्राथमिकता देती है, तो केवल नई योजनाओं और सुविधाओं की घोषणा पर्याप्त नहीं होगी। मौजूदा मशीनों की देखभाल भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी। अस्पताल में उपलब्ध सुविधा तभी मरीज के लिए उपयोगी है, जब जरूरत के समय वह काम कर रही हो या उसके बंद होने पर वैकल्पिक व्यवस्था मौजूद हो।
जग प्रवेश चंद्र अस्पताल की घटना ने इसी बुनियादी सवाल को सामने ला दिया है। एक नौ वर्षीय बच्ची चोट के बाद अस्पताल पहुंची। डॉक्टर ने एक्स-रे कराने की सलाह दी। लेकिन मशीन खराब होने के कारण करीब चार घंटे तक जांच नहीं हो सकी। दूसरी ओर, कलाई में चोट लेकर पहुंचे अजय को भी लगभग चार घंटे इंतजार करना पड़ा। दोनों मामलों में मरीजों को जांच के लिए लंबे इंतजार का सामना करना पड़ा।
आगे क्या होगा, इस पर टिकी नजर
फिलहाल इस मामले में सबसे अहम बात यह है कि अस्पताल में X-ray machine खराब होने के कारण मरीजों को कितनी परेशानी हुई और क्या इसके बाद कोई वैकल्पिक व्यवस्था की गई। उपलब्ध स्रोत में संबंधित अधिकारियों की ओर से इस मामले पर कोई जवाब शामिल नहीं है। इसलिए आगे की स्थिति उनके आधिकारिक पक्ष और कार्रवाई के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
सरकारी अस्पतालों में diagnostic services की उपलब्धता मरीजों के लिए बुनियादी जरूरत है। इसलिए किसी आवश्यक मशीन के खराब होने पर तत्काल वैकल्पिक समाधान की जरूरत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। खासकर तब, जब मरीज चोटिल हो और जांच डॉक्टर की सलाह पर आवश्यक मानी गई हो।
जग प्रवेश चंद्र अस्पताल की यह घटना इसी सवाल को केंद्र में लाती है कि तकनीकी खराबी की स्थिति में मरीज को कितना इंतजार करना पड़ता है और अस्पताल उसके लिए कितनी जल्दी दूसरा रास्ता उपलब्ध कराता है। अब देखना होगा कि संबंधित अधिकारी मामले का संज्ञान लेकर जांच सुविधा को सामान्य करने और मरीजों की शिकायतों का समाधान करने के लिए क्या कदम उठाते हैं।
